आदरणीय सोमा जी
सादर
आपकी प्रतिक्रिया जान कर ख़ुशी हुई मेरा होंसला अफजाई का शुक्रिया. आपने एक साथ कई सवाल कर दिए जिनका एक साथ पत्र के माध्यम से उत्तर देना शायद एकदम संभव नहीं हो पर में संक्षिप्त में प्रयास करूँगा.
१ सामुदायिकता की भावना आदिवासी समाज में भी लगभग खत्म होने के चरण में चल रही है जो एक चुनोती है.
२ निजीकरण आज के समाज का अभिन्न अंग बन गया है क्योंकि सामुदायिक संसाधन और उस पर निर्भर सामुदायिक रूप के मानवश्रम की जरुरत अब कम होती जा रही है। क्योंकि कृषि खत्म हो रही वन उपज खत्म हो रही है और ये सब काम सामुदायिकता पर निर्भर है जो कम होते जा रहे है और पलायन बढ़ रहा है और रोजमर्रा की मजदूरी पर निर्भरता बढ़ रही है. संयुक्त परिवार की अवधारणा अब बीते कल की बाते हो गई है सभी रिश्तों पर पैसा भारी पड़ रहा है और पैसे से दुनिया में सब कुछ किया जा सकता है ये धारणा जोर पकड़ रही है इस कारण दुनिया में बाजार सबसे शक्तिमान बन गया है और दुनिया की सारी सत्ताएं उसके आगे कमजोर पड़ गई है इसी कारन व्यक्तिवाद बढ़ रहा है और सामुदायिकता खत्म हो रही है।
३ आदिवासी समाज की दुनिया सबसे ख़राब हालत है तो इसमें भी तुलना की जाये तो इस समाज की महिलाओं की हालत बदतर है। क्योंकि प्रय्तेक संकट और विपरीत हालत का असर महिलाओं पर सबसे ज्यादा पड़ता है और महिलाओं के पारिवारिक दायित्वों को निभाने के काम को अनुत्पादक माना जाता है जो आदिवासी समाज में ही नही सब समाजों में विद्यमान है इसके अलावा दुनिया में महिला सबसे सरल शिकार है जिसे आसानी से निशाना बनाया जा सकता है उसके बाद बच्चे आते है। इस दुनिया में हर शेत्र में तनाव बढ़ गया है और इसके कारण असफल होने पर आदमी अपनी ओरत पर खीज निकलता है क्योंकि सामुदायिक संसाधन खोने के कारण आर्थिक गुलामी बढ़ी है जिसका असर आय पर पड़ा है इसलिए आदमी बाजारवादी ताकतों और वयवस्था का तो कुछ नही बिगड़ सकता वो घर आ कर अपनी ओरत और उसके बाद भी गुस्सा नही उतरा तो बच्चों पर निकलता है ये एक आदमी के कमजोर और नाकाम होने की निशानी है।
४ अतिक्रमण की कई परिभाषा है गरीब आदमी करे तो अतिक्रमण और सरकार करे तो जनहित।
वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के दोरान हम महसूस कर रहे है की सामुदायिकता की भावना की क्या हालत हो गई है सभी लोग अपनी कब्जे की जमीन को पहले चाहते है इसका कारण यही है की सामुदायिकता समाज में केवल तीज त्योहारों और समारोहों तक ही सिमित हो कर रह गई है मुद्रा के संबंधो ने सामुदायिकता को खत्म कर दिया है और श्रम आधारित समाज को खत्म कर निक्क्मो की फोज इस व्यवस्था ने खड़ी कर दी है जो सब अपने अपने अलग अलग जहाँ को बसाने के चक्कर में लग गए है
मांगीलाल गुर्जर
जंगल जमीन जन आन्दोलन
उदयपुर
1 comment:
I agreed wid u ML Gurjar, I want to say u thanks 4 Ur good and vry seriouse thoughts on Changing environment among community people, specially tribal which are known 4 their unity and community based approaches in day to day life. Ur worriness is showing ur dedication toward that community.
Thanks 4 giving such kind of thouughts!
Regards,
Shiv Kumar Acharya
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